शिशु मंदिर योजना का स्वरुप एवं परिचय

संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी की प्रेरणा एवं हनुमान पोददार के प्रयास से सन् 1952 में प्रथम शिशु मंदिर, गोरखपुर उ.प्र. में प्रारम्भ हुआ। आज देष में लगभग 20 हजार शिशु मंदिर हैं।। इनमें 35 लाख छात्र एवं 1लाख30हजार आचार्य कार्यरत् हैं। कष्मीर से कन्याकुमारी एंव अटक से कटक(उड़ीसा) तक सभी राज्यों में शिशु मंिदर योजना के विद्यालय सफलतापूर्वक संचालित हैं सन् 1978 में इसे एक राष्ट्रीय संगठन का स्वरुप प्राप्त हुआ जिसे विद्याभारती अ.भा.शिक्षा संस्थान के नाम से जाना जाता है। सम्पूर्ण देष के 11 क्षेत्रों में 19 प्रादेशिक समितियाॅ इसका कार्य देख रही है । शिशु मंदिर मातृभाषा शिक्षण के सर्वश्रेष्ठ विद्यालय हैं। समाज का विष्वास प्राप्त कर विषेष रीतिनीति एवं कार्यपद्धति के साथ यह शिक्षा केन्द्र आगे बढ़ते जा रहें है।

 शिशु मंदिर कार्य पद्धति:-

  1. हमारी कार्यपद्धति दानव को मानव एवं मानव को देव बनाने की पद्धति है।
  2. कार्यपद्धति का केन्द्र विद्या मंदिर है।
  3. भारतीय संस्कृति एवं जीवनमूल्य के आधार पर सर्वांगीण विकास।
  4. संस्कार युक्त शिक्षा के माध्यम से समाज परिवर्तन का प्रयास।
  5. वन्दना सभा एव ंपरिणामकारी कार्यक्रम ।
  6. भारतीय उत्सन एंव शारीरिक प्रदर्षन ।
  7. प्रति सप्ताह बालसभा का आयोजन ।
  8. वर्ष में न्यूनतम एक अभिभावक सम्मेलन,मातृसम्मेलन ।
  9. वर्ष में एक बार भैया-बहिन का वन संचार देषदर्षन।
  10. संस्कृति ज्ञान परीक्षा का आयोजन ।
  11. राष्ट्रीय खेलकूद एवं विज्ञान मेला तथा बौद्धिक प्रतियोगिताऐं।
  12. अखिल भारतीय निबन्ध लेखन प्रतियेागिता ।
  13. पूर्वछात्र एवं आचार्य परिषद-सम्मेलन ।
  14. आचार्यो के विविध प्रशिक्षण वर्ग आयोजन।
  15. परिवार सम्पर्क अभिभावक सम्पर्क ।
  16. समिति सम्मेलन एवं प्रबंधन ।
  17. संस्कार केन्द्र , एकल विद्यालय का संचालन ।
  18. समाज प्रबोधन -गोष्ठियां ।